Friday, July 21, 2017

याद तुम्हारी

"अगर उसने कुछ सोचा होगा तो
मुझे भी सोचा होगा
हल्के-हल्के हाथों से फिर,
अपनी आँखों को पोंछा भी होगा
देख उँगली पर अटकी बूँद-
एक हल्की सी मुस्कुराती लकीर,
उसके होंठो को छूकर गुज़री होगी
और झटक दिया होगा सिर कि -
ये यादों का लोचा होगा ......."
.-अर्चना चावजी

Tuesday, July 18, 2017

बरसो रे !

भूल गए हैं बादल अब बरसना वहाँ ,
खूब बरसती है आसमान से आग जहाँ....

भागते मेघों का गर्जन भी दब जाता है
काली बदली को पवन जाने कहाँ उड़ा ले जाता है

मोर,पपीहे,कोयल सब अब मौन मौन ही रहते हैं
नदिया ठहरी,झीलें सूखी,झरना भी नहीं गाता है

थिरकती बूँदों के नृत्य कौशल को देखने 
हर बूढ़ा पेड़ व्याकुल नजर आता है...

Monday, July 17, 2017

क्यों लड़ते हैं लोग घरों में ?

उसके घर का आने -जाने का रास्ता घर के पिछले हिस्से से होकर है ,मेरे और उसके ,दोनों घर के बीच में सामान्य अन्तर है .. बातचीत, नोक-झोंक ...सब सुनाई देता है ...
कामकाजी बहू है ..... सास और बहू दोनों ताने देने में मास्टर हैं ....

- खा-खा कर मोटी हो रही है
-इनके लिए हड्डी तोड़ते रहो तब भी चैन नहीं पड़ेगा
- काम पे क्या जाती है  ,इनके पर निकल आए हैं..
- जा बेटा ,साबुन से हाथ धोना ... तेरे लिए मैं लेकर आई हूँ  साबुन ...
....
....

"कान पक गए" .....मुहावरा पक्के से समझ आ गया है ..... :-(

हर छुट्टी के दिन पूरा दिन ... खराब हो जाता है ...
और तो और त्यौहार भी नहीं बचते ....
.
....

...क्यों लड़ते हैं लोग ...घरों में .....

Friday, July 14, 2017

बरसात की शिकायत - व्यंग्य

आज सुनिए यामिनी चतुर्वेदी जी के ब्लॉग मनबतियाँ से एक व्यंग्य-




चुपचाप रहने के दिन

ये बारिशों के दिन। ..
चुपचाप रहने के दिन ....

मुझे और तुम्हें चुप रहकर
साँसों की धुन पर
सुनना है प्रकृति को ....
. उसके संगीत को ...
झींगुर के गान को ..
मेंढक की टर्र -टर्र को...
कोयल की कूक को...
और अपने दिल में उठती हूक को। ....
....
बोलेंगी सिर्फ बुँदे
और झरते-झूमते पेड़
हवा  बहते हुए इतराएगी...
और
अल्हड़ सी चाल होगी नदिया की

चुप रहकर भी
सरसराहट होगी
मौन में भी एक आहट होगी
...
उफ़! ये बारिशों के दिन ..
चुपचाप रहने के दिन।
-अर्चना

Wednesday, July 12, 2017

छठी इंद्री

जब भी जुलाई का महीना आता है तारीखें सामने आती है और उनसे जुडी घटनाएं भी ..सबसे पहले सुनिल का जन्मदिन 13 को फिर 20 को पल्लवी का ....कितना सुखद संयोग बेटी और पिता का जन्मदिन जुलाई में और माँ और बेटे का अक्तूबर में.......
खुशी के साथ ही ये महीना दुःख भी ले आता है .....सब कुछ आँखों के सामने आ जाता है बिलकुल किसी फ़िल्म की कहानी की तरह ......
बाकि सब तो समय के साथ स्वीकार कर लिया ....लेकिन एक बात मुझे आज भी अचंभित करती है.....ये तब की बात है 1993 के जुलाई माह से कुछ पहले की शायद 1 महीने पहले से कई बार एक सपना आता जिसमें मुझे लगता की मैं नीचे की और सीढियाँ उतर रही हूँ..सीढ़ियों पर पानी बहते  जा रहा है,फिसलन है,बहुत भीड़ है बहुत लोग धक्का देते हुए उतर रहे हैं....मेरे साथ बच्चे हैं मैं उनको सम्भालते हुए उतरती  जा रही हूँ ..और बहुत  नीचे एक मंदिर है जहाँ दर्शन होते है ...सुनिल  पर गुस्सा भी करती जाती हूँ कि आप तो नीचे नहीं उतरे ऊपर से हाथ जोड़ दिए मुझे दोनों बच्चों को लेकर उतरना कितना कठिन हो रहा है ......भगवान कौनसे हैं ये दिखने से पहले सपना टूट जाता और मैं याद करती तो लगता बड़वानी के गणेश मंदिर जैसा जो कुँए के पास था....और आधे कुँए में उतरकर दर्शन करते थे ....सोचती ये तो वही मंदिर है जो भाभी के घर वाला है ...ननिहाल जाने पर बचपन से देखते रही हूँ...
लगता देखा हुआ है इसलिए सपने में दिखता होगा ...लेकिन जब सुनील के शिलाँग के पास  24 जुलाई को हुए  एक्सीडेंट की खबर 25 जुलाई को रांची में  मिली और बच्चों को छोड़  गौहाटी जाना पड़ा ....तब सुनिल 2 महीने कोमा में थे ...कोई चारा नहीं था सिवा प्रार्थना के ...वहाँ किसी ने बताया  कामाख्या मंदिर में जाओ.....तो मैं पहली बार गई उनके  लिए प्रार्थना करने ..जैसे ही मंदिर में प्रवेश किया ....हूबहू सपने वाली जगह लगी...और जब माताजी का दर्शन किया तो लगा  मुझे सपने में यही बहता पानी ....दिखता था .....2 महीने में बहुत बार गई....हर बार सपना सच्चा ही साबित हुआ ...बिलकुल वही मंदिर .....और एक बात कि उसके बाद कभी वो सपना नहीं देखा ....उनको  तो बचाकर लौटा नहीं पाई मैं ...लेकिन उसी शक्ति ने ...साहस भरा यहाँ तक आने का ....
हर जुलाई में ये घटना ताज़ी होकर याद आ जाती है ...क्या ये पूर्वाभास था ?छठी इंद्रीय द्वारा ......

Tuesday, July 11, 2017

मानसून


(काजल जी के nonsoon/मानसून लिखने पर ..चलती बस में लिखी थी 2014 में ...)---

माssssन सून....तेरी झड़ी में कई गुन
जल्दी से बरसने को तू अब मेरा शहर भी चुन....

काले-काले बादलों की एक सुन्दर चादर बुन
सूरज को तू ठंडा करके बना दे एक और मून...

सुनने को हम तरस रहे अब मेंढकी धुन
मंहगाई भी पोर-पोर से चूस रही है खून...

पसीने-पसीने बह गए सबके तेल -नून
आस है तेरे आने पे मिलेगी रोटी दो जून....
-अर्चना

हिमांशु कुमार पाण्डेय जी की कविता बादल तुम आना -



आज चलिए मेरे साथ हिमांशु कुमार पाण्डेय जी के ब्लॉग सच्चा शरणम् पर , सुनिए उनकी कविता -

बादल तुम आना -


Monday, July 10, 2017

जब ये तब वो

ब्लॉग पोस्ट को ब्लॉग पर पब्लिश करने के साथ ही अन्य प्लेटफार्म पर शेयर करने की सुविधा देती है ये साईट -

IFTTT      इसका मतलब ही है -



यानि हिन्दी में कह सकते हैं - जब ये तब वो 

इस पर खुद को रजिस्टर कीजिये और अनगिनत लाभ लीजिये इसके Applets का उपयोग करके। ... कैसे उपयोग करना है ये साईट खुद ही समझा देगी | 
इस पर आप सर्च में जाकर ब्लॉगिंग को चुनिए क्योंकि अभी ब्लॉगिंग के लिए सुविधा चाहिए। .. 

हाँ पोस्ट के Url  के साथ #हिंदी_ब्लॉगिंग टैग भी देना न भूलियेगा ,और जो भी टैग आप देना चाहें। .. 

यहां से आपकी ब्लॉगपोस्ट फेसबुक, ट्वीटर या इस जैसे ढेरों सोशल साईट्स पर आपकी सुविधानुसार ब्लॉग पर पब्लिश होते ही शेयर हो जायेगी आपको अलग से लिंक देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। ... 

मेरी सारी पोस्ट  फेसबुक ,ट्वीटर के साथ ही फेसबुक  के पेज पर भी शेयर होती है। .. 

इस साईट से आप कई अन्य लाभ भी ले सकते हैं जैसे -
ट्वीटर से फेसबुक पर 
ट्वीटर से ब्लॉग पर...  और भी बहुत सी 



#हिन्दी_ब्लॉगिंग के पुनर्जीवन हेतु #ब्लॉग_पुरानी_गली

Saturday, July 8, 2017

बरसात

घड़ घड़ घड़ घड़ करते उसने शोर मचाया, मैं जानती थी ये बादल का इशारा था ये कि -भाग लो,समेट लो, जितना बचा पाओ बचा लो ,अब बरसा दूंगा , मैंने ऊपर देखा गोरे बादलों की जगह काले बादलों ने ले ली थी ,H1 B1 का कोई चक्कर नहीं था उनके बीच ... मैनें नीचे देखा खेती वाली जमीन के फटे होंठ मुस्कुराने को तैयार थे, लेकिन सड़कें डरी सहमी चेचक के दाग लिए बैठी थी ...बैठी क्या कुचली जा रही थीं ... नदी रास्ता देख रही थी कब झरने उसको बेटन दें और वो अपने हिस्से की दौड़ लगाएं, वहीं झीलों में टीनएजर्स वाली बेसब्री दिखने लगी,थोड़ी दूरी पर झील की बाउंडरी से सटे किनारे पर बीपीएल के पते वाली जनता के बच्चे अपने आसरे के बाहर कुत्तों के पिल्लों समेत दिखे वे उनको छत के नीचे सुला रहे थे। मैनें फिर ऊपर नज़र उठाई देखा मेरे साथ बादल भी ये देख रहे थे वे आपस में गुथ्थमगुथ्था हो रुक से गये बूँदे ऐसे गिरने लगी जैसे कोई धक्का दे गिरा रहा हो, कुत्ते के पिल्ले को छुपा कर बैठे सल्लू को हाथ से खींच कर उसकी माँ ने अपनी खोली में खींच लिया,बाजू की 12 मंजिली मल्टी के छत पर कुछ जोड़े दिखाई दिए हाथ फैलाकर भीगते हुए, एक तरफ बचाव था तो एक तरफ स्वागत ... लेकिन बादलों ने बरसने को तैयार बून्दों को समझा कर फिर समेट लिया  फिर किसी दिन बरसा देने का वादा करके ....बरस चुकी बूँदे सल्लू के माँ -बाप की और जमीन के फटे होंठ को सहलाते किसान की आंखों में समा गई ....

घुघूती बासूती जी की कविता - कब तुम आओगे


घुघूतीबासूती के ब्लॉग घुघूतीबासूती  से उनकी लिखी एक कविता - 


कब तुम आओगे 


Thursday, July 6, 2017

वंदना अवस्थी दुबे की कहानी - विरुद्ध

http://wwwvandanaadubey.blogspot.in
  से एक कहानी 


अहा! #हिन्दी_ब्लॉगिंग

टिप्पणी न आना कोई विशेष कारण नहीं लगता ब्लॉगिंग कम होने का,वो तो आज भी उतनी ही आ रही होंगी ...
हमारा आपसी संपर्क टूटना एक महत्वपूर्ण कारण था ,हमारीवाणी, चिट्ठाजगत से हमें बाकी ब्लॉगों तक पहुंचने में सुविधा होती थी,हालांकि मैं कई नए ब्लॉगों तक पहुँची, टिप्पणियों से होकर भी...मेरी ब्लॉगिंग में कम पोस्ट का आना अति व्यस्तता के बाद भी जारी था , याद आता है 2012 में जब बच्चों की शादी की तारीख तक मैंने पोस्ट लिखी,लेकिन अप्रत्याशित अनहोनी ने मुझे पंगु कर दिया और उसके बाद से अतिव्यस्तता रही,नेट,कम्प्यूटर की अनुपलब्धि भी एक कारण रहा। लेकिन फिर भी ब्लॉगिंग ने मुझे जो दिया वो असम्भव था ब्लॉगिंग बिना पाना ।

याद है चेटिंग का वो दौर जब सामने से किसी का जबाब आते घर के सब जमा हो जाते पास कि अरे देखो बात हो रही है ...
सबसे पहले छोटी बहन रचना से ब्लॉगिंग के बारे में सुना,वो कब और कैसे लिखने लगी ये बताने के साथ ही उन्मुक्त,समीरलाल,अनूप शुक्ल जी के नामों से परिचय हुआ ...उन्मुक्त जी में तो मुझे मेरे पिता की छवि ही दिखती है,वैसी ही समझाईश और सलाह उनके चिट्ठे पर मिलती है सदा...समीरलाल मेरे मित्र बने ऐसे लगता है जैसे हम एक क्लास के सहपाठी हों ,खूब होमवर्क करवाया उन्होंने हम दोनों बहनों से हमको बिना बताए ... :-)
दिलीप और दीपक से स्नेहाशीष के साथ बात होती थी,उनका माँजी और मासी कहने के साथ परिवार में शामिल होना, आज सबको सुनकर आश्चर्य लग सकता है, बात भले साल में एक या दो बार बात हो रिश्ता बरकरार है।
जब मेरा परिचय सलिल भैया से हुआ तो जो बच्चे उनके संपर्क में पहले आते मुझे बुआ कहने लगे ....
और एक खास बात जितने रिश्ते बने उनपर हक भी उतना ही जताते हैं हम उस दौर के ब्लॉगर...
भाई, बहन,चाचा,सखा,मित्र के साथ यहाँ पिता और माता भी मिले....

जब वीडियो चेट सीखा, गिरीश बिल्लोरे जी के परिवार के साथ शाम के कई डिनर वीडियो चेट पर किए....जब रूपचंद्र शास्त्री जी के साथ बात हुई तो उनके यहां  सिद्धेश्वर जी के ब्लॉग से पहले उनसे नमस्ते हुई थी ....
रिकार्डिंग को ब्लॉग पर पोस्ट करना सिखाया सागर नाहर जी ने esnip का पाठ विस्तृत समझाकर मेल में ...तब विधिवत शुरुआत हुई पॉडकास्टिंग की
पॉडकास्ट बनाते समय हुए परिचय के साथ ही खूबसूरत रिश्ते बनते चले गए ...
अनुराग शर्मा जी ,सलिल भैया और ठाकुर पद्मसिंग जी के साथ पॉडकास्ट की तगड़ी टीम आज भी बनी हुई है ..
आपस में मिले बगैर -
दिलीप का मैसूर में मेरे कहने पर मेरे भाई की बेटी के जन्मदिन पर  उपहार लेकर जाना और मेरी उपस्थिति दर्ज करना, यहाँ दीपक की माताजी से बात करना,गिरीश बिल्लोरे जी का मेरी खो खो टीम के लिए बीच रास्ते में जबलपुर में डिनर पैकेट पहुंचाना,
मेरा प्रवीण पांडेय जी के यहां सुबह की ट्रेन पकड़ने के लिए पहली बार मिलने पर ही रात रुकने का आग्रह और दीपक का सफर से रात देर तक घर न पहुंच पाने  पर मेरा भतीजी के साथ इंतजार करना ,रायपुर में ललित शर्मा जी का बाईक पर लेने आना बाकी ब्लॉगरों से मुलाकात के लिए ...जैसी घटनाएं ब्लॉगिंग की बनिस्बत ही घटी ...
जिनके लिए अलग से ब्लॉग पोस्ट लिखी जाए तो भी खत्म न हों ...

नमस्ते के साथ शुरू हुई बात आज भी 50% ब्लॉगरों के साथ जारी है ...  पहले कनिष्क के "ब्लॉगप्रहरी" पर भी उपस्थिति दर्ज रही उसमें चेट की सुविधा भी थी , खास बात mp3 फाईल का सीधे अपलोड होना लगता था मुझे ...
ब्लॉग सेतु पर आज भी प्रयोग करने का मन है ...

आज किसी को टैग नहीं किया... जिनके नामों का उल्लेख मैंने किया मेरी किसी न किसी ब्लॉग पोस्ट में वे और उनके ब्लॉग लिंकित हैं ,आप खोजिये और पहुंचिए उन तक ... यही ब्लॉगिंग की पहचान है .....

और भी बहुत कुछ बाकि है बताने को फिर कभी ....

Wednesday, July 5, 2017

नो हिन्दी इन #हिन्दी_ब्लॉगिंग

OH! my God!
I'm alone
want to call you
but ,
not working my phone
I 'm looking
on your tip- tip string....
and listining your tring..tring
what a lovely.. musical sound ..
with that ,
I feel you...
all around.....

-Archana

Tuesday, July 4, 2017

चश्में की जरूरत नहीं ,जब मां साथ होती है ...

माँ मोरारीबापू की कही राम कथा सुनती हैं, मैं यूट्यूब पर लगा देती हूँ, आज आर्मी के जवान दिखाई दे रहे हैं एक वीडियो में ,अमरनाथ में कही कथा का वीडियो है, अंत में एक गीत गाया उन्होंने दे दाता के नाम तुझको अल्लाह रखे.... माँ को अचानक कुछ  याद आया बोली - ये "आँखे"फ़िल्म का गीत है,ललिता पंवार थी उसमें ..... "बेन"(उनकी सास यानि मेरी दादी) भोपाल में देख के आए थे, तो आकर मुझसे बोले थे कि जाकर देख के आना, बहुत बढ़िया है....फिर हम गए थे देखने ...

एक याद अच्छी सी .....मेरी याद की अलमारी में सहेजने को जिसे #मायरा तक पहुंचाना है मुझे ......

चश्में की जरूरत नहीं ,जब मां साथ होती है ...

कुछ बातें समझने -समझाने की #हिन्दी_ब्लॉगिंग

ये कोई प्रवचन नहीं.. :-) माता-पिता से सीखी बातें हैं -

१)  सदा सच बोलो | 
सच बोलने से किसी से भी डर नहीं लगता | कोई भी बात एक ही बार बोलनी पड़ती है|हम किसी के साथ धोखा या गलत कर रहे हैं, इस हीन भावना से छुटकारा मिल जाता है, दिल पर जो बोझ सा होता है वो नहीं रहता,|हमारे प्रति अपनों का विश्वास बढ़ जाता है |
सत्य कि सदा विजय होती है|

२) विस्वासपात्र बनो|
विश्वास या भरोसा क्या है? जो एक बच्चे को अपनी माँ पर है, विश्वास ही अपनत्व की  जननी है ,विस्वास ही है जो हमें एक- दुूसरे से जोड़ता है, जीवन में विश्वास या भरोसा ही है जिसके दम पर दुनिया टिकी है , एक बार विश्वास टूट जाता है तो बहुत मुश्किल होती है दुबारा विश्वास पाने में |
विस्वास कि शक्ति से मिलता है - लक्ष्य |

३) समय के साथ चलो | 
समय लगातार चलते ही रहता है,हमारी एक गलती भी हो जाए यानि एक कदम भी गलत  पड़ जाए  तो हम समय से पीछे हो जाते हैं,अत: जरूरी है कि हर कार्य के लिए समय सीमा तय करें व फिर नियत समय पर कार्य पूर्ण करने की आदत डालें |
समयानुसार चलने से शायद हम समय के साथ चल पाएंगे |

४) मन को काबू में रखो | 
बहुत बार सुनते हैं कि मन को काबू में रखो ,मगर  मन क्या है? मन में हमारे अच्छे और बुरे किये गए कार्यों का  लेखा-जोखा रहता है| मैं यह मनाती हूँ कि कोई भी इंसान चाहे वो छोटा हो या बड़ा , नाबालिग हो या बालिग़ ,अच्छा हो या बुरा,सभ्य  हो या असभ्य ,उसका मन ही जानता है कि वह किसी के साथ अच्छा कर रहा है या बुरा , किसी को धोखा दे रहा है या उससे झूठ बोल रहा है , और ये जानने के लिए उसे किसी दुूसरे कि सलाह कि जरूरत नहीं पड़ती | 
अगर हम अपने अन्दर की आवाज को सुनने और उस पर अमल करने कोशिश करते हैं तो मन को काबू में किया जा सकता है |

५) आदत|
किसी अच्छे कार्य को तब तक करना चाहिए , जब तक कि हमें उसे करने की आदत न पड़ जाए, और किसी बुरे काम से तब तक बचना चाहिए या दूर रहना चाहिए ,जब तक कि उससे बचने या दूर रहने की आदत न पड़ जाए
जब हम पहली बार झूठ बोलते हैं तो बहुत मुश्किल होती है,दूसरी बार बोलना थोड़ा आसान हो जाता है और तीसरी बार और भी आसान ,इस तरह झूठ बोलने कि आदत पड़ जाती है |
 पहली बार की गई गलती को भूल माना जा सकता है , दूसरी बार में सजा का प्रावधान हो सकता है ,लेकिन तीसरी बार की गई गलती जान-बूझ कर की गई होती है और अक्षम्य होनी चाहिए |
एक बार अच्छी आदत डाल लें तो नियम बन जाता है |

६) अच्छा या बुरा 
अच्छा या बुरा क्या है? किसी भी कार्य को करने से यदि किसी अन्य को या स्वयं को हानि या नुकसान या दुःख पहुंचता है तो वह बुरा कार्य है, और इसके विपरीत सबको फ़ायदा या लाभ पहुंचाने वाला कार्य अच्छा कार्य है |

७) जिम्मेदारी 
जितने लोगों को हम अपना सनाझाते हैं,उनके प्रति कर्तव्यों का निर्वाहन जिम्मेदारी है |
सिर्फ परिवार तक ही न सीमित रहें , रिश्तेदारों , दोस्तों, पड़ोसियों, व समाज को भी धीरे-धीरे "अपनों" में शामिल करें|

 #हिन्दी_ब्लॉगिंग


   

Sunday, July 2, 2017

संजय झा मस्तान के लिखे व्यंग्य - "मैं टॉपर कैसे बना " का पॉडकास्ट

इन दिनों फेसबुक की वॉल का उपयोग व्यंग्य की जुगलबंदी के तहत-तरह तरह के विषय पर कलम चलाने के लिए किया जा रहा है। ..उसी के अंतर्गत एक विषय था - टॉपर , इस विषय पर फिल्मकार संजय झा मस्तान के लिखे  व्यंग्य - "मैं टॉपर कैसे बना " का पॉडकास्ट आप यहां सुन सकते हैं -


और इसे पढ़ने के लिए - लिंक 


Saturday, July 1, 2017

मोबाईल से लिखें ब्लॉग पोस्ट



जीवन लगातार सीखते रहने के लिए ही है सीखिए और सिखाईये -
आज सीखते हैं मोबाईल द्वारा ब्लॉग पोस्ट लिखना - 

१) सबसे पहले मोबाईल पर गूगल प्ले स्टोर से "ब्लॉगर" एप्प डाउनलोड कीजिए।



२)जब ब्लॉग खोलेंगे तो ये स्क्रीन दिखेगा ,पेंसिल का उपयोग करेंगे तो नई पोस्ट लिखने के लिए खुलेगा ब्लॉग-





३) इसमें आप अपनी पोस्ट, कंटेंट के अंतर्गत लिखिए,बाकी पूर्ति भी कीजिए -




४) अंत में पोस्ट को ब्लॉग पर पब्लिश करने के लिए इस चिन्ह पर क्लिक करें ।



५) आप अपना ब्लॉग यहां से देख सकते हैं , और हर बार नई पोस्ट देखते समय रिफ्रेश कर लें,



६) आपके सारे ब्लॉग आपको इस बटन से मिलेंगे और आप अपने हर ब्लॉग पर पोस्ट लिख सकते हैं आसानी से





७) अपने ब्लॉग को फ़ोटो से सुसज्जित करने के लिए कैमरे के बटन का इस्तेमाल करें।फोटो पोस्ट के अंत में प्रकाशित होंगे | 




ड्राफ्ट में रखकर आप पोस्ट को चेक कर सकते हैं|

अगर आप सीधे ब्लॉग पर नहीं लिखना चाहते तो Notes में लिखें वहां से कॉपी-पेस्ट कर सकते हैं कंटेंट



आप ब्लॉग पर सीधे ईमेल से भी पोस्ट कर सकते हैं , इसके लिए आपको अपने मेल में पोस्ट लिखनी होगी और ब्लॉगर पर सेटिंग करनी होगी  -


और अगर आप ऐसा करते हैं तो आपको ब्लॉगर एप्प डाउनलोड करने की आवश्यकता नहीं रहेगी लेकिन इसमें प्लेयर नहीं पोस्ट होगा और लेबल नहीं किया जा सकेगा , ईमेल का कंटेंट आपका ब्लॉग पोस्ट होगा और सब्जेक्ट आपका शीर्षक होगा |

अगली पोस्ट में बताउंगी जल्द्दी ही की ब्लॉग पोस्ट कहाँ और कैसे एक क्लिक में शेयर की जाए ,कैसे ?


#हिन्दी_ब्लॉगिंग

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

Thursday, June 29, 2017

मेल मुलाकात और गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी का गीत

गिरिजा दी से इस बार फिर मुलाकात हुई बंगलौर में ,इस बार रश्मिप्रभा दी के घर हम मिले।ऋता शेखर भी साथ थी, गिरिजा दी और रश्मिप्रभा दी पहली बार एक -दूसरे से मिल रही थी, और फिर जो दिन भर बातों में बीता पता ही नहीं चला शाम के 6 बजे पहली बार घड़ी देखी और फिर देर हो गई,देर हो गई करते करते 7 बज गए ।बहुत आत्मीय रही मुलाकात सबकी,बहुत अच्छा लगा ,खास बात ये की चारों ब्लॉग लिखती हैं।
वहीं ऋता जी ने भी अपनी कुंडलियों का और गिरिजा दी ने अपना गीत संग्रह - "कुछ ठहर ले और मेरी जिंदगी"भेंट दिया , आज उसी संग्रह से एक गीत - "सर्वव्यापक" गाने  का प्रयास किया है आप सब भी सुनियेगा -
(प्लेयर को सक्रिय करें, एक बार में न हो तो पुनः करें)



Wednesday, June 28, 2017

रविशंकर श्रीवास्तव जी के व्यंग्य का पॉडकास्ट


व्यंग्य की जुगलबंदी के अंतर्गत "खेती" विषय पर लिखे गए रविशंकर श्रीवास्तव जी   




के ब्लॉग "छींटे और बौछारें " पर प्रकाशित व्यंग्य -


भारतीय खेती की असली, आखिरी कहानी

यहाँ  सुनिए -



  इसे आप यहां भी सुन सकते हैं -


हास्य-व्यंग्य पॉडकास्ट - जुगलबंदी - खेती


Sunday, June 25, 2017

योगा के योगी

सुबह उठते ही नाक लंबी लंबी साँसे  लेने को व्याकुल हो उठती है ,जीभ फडफडाकर सिंहासन करने को उग्र हो जाती है, गला दहाड़ कर शेर से टक्कर को उद्दत होने लगता है , बाकी शरीर मरता क्या न करता वाली हालत में शवासन से जाग्रत होने पर मजबूर हो जाता है बेचारा, योग की आदत के चलते ...
योग का मतलब प्राणायाम युक्त शारीरिक व्यायाम ज्यादा अच्छा है समझने को , अब समझें प्राणों का आयाम ...
सिर्फ सांसो का आना जाना जीवन नहीं , उसका उछलना,कूदना डूबना,उतराना,चढ़ना, उतरना ,भागना,रूकना जी-वन है, इस हर क्रिया में शरीर को चुस्त दुरुस्त बनाये रखना योग का एक भाग हो सकता है ।
योग का एक मतलब जोड़ भी होता है उस अर्थ में एकाग्रता को केंद्र में रखा जा सकता है कि प्राणवायु के साथ शरीर और मन जुड़कर रहे ,जुड़े रहकर सबको जोड़े रह सकें।
योग व्यंग्य का विषय तो नहीं होना चाहिए पर बना दिया गया ।
पहले योग में सब कुछ त्याज्य की भावना प्रबल थी अब ग्राह्य भावना का जोर है ,जोड़ने के नाम पर सबसे पहले योग में मात्रा जोड़ योग को योगा बना लिया गया, फिर नंगधडंग शरीर को ढँकने के यौगिक वस्त्र अपनाए जाने लगे , दरी की जगह मेट ने ली जिसके गोल गोल रोल ही उठाए जा सकते हैं जो दृष्टिगोचर होते रहें जिससे दूर से ही व्यक्ति यौगिक लगे।
बचपन में जबरन योग शिविर में जो कुछ सीखा वो भी इसलिए कि बाकी लोग वो आसन नहीं कर पा रहे थे पर मन पर असर कर गया।
मुझे याद है जब छठी कक्षा में थी एक योगी आया था स्कूल में अपने योग का प्रदर्शन करने ,हमारी कन्याशाला थी ,सब लड़कियों को एक हॉल में इकठ्ठे किया गया और करीब 2 घंटे तक उसने भिन्न भिन्न क्रियाएं और आसन करके दिखाए थे,जब उसने अपना पेट उघाड़ के आँतड़ियों को मथते हुए दिखाया सब मुँह दबाकर हंसने लगे थे लेकिन उसका तेजोमय चेहरा आज भी उसकी याद दिला देता है,जो आंतरिक तेज से जगमग था शायद....
आज लोग खा पीकर मोटापे से त्रस्त हो रहे हैं और योग बाबाओं की भरमार हो गई, योग भी वस्तु की तरह बाज़ार में आ गया ..और चेहरे को तेजोमय बनाने की यौगिक क्रीम ,तेल उपलब्ध हैं ...शरीर पर असर करने से ज्यादा जेब पर असरकारी हो गया योग और चेहरे का तेज आंतरिक न होकर बाह्य रह गया ....समय और सत्ता परिवर्तन के चलते कालांतर में राजनीति भी सीख लिए योगी...
परिणाम स्वरूप बन गया - यही व्यंग्य का विषय !!!

Thursday, June 22, 2017

देनेवाला श्री भगवान!


सोते हुए लगा
कल उठूंगी या नहीं
कौन जाने!

भोर में आँख खुली ...
खुद को जागा हुआ
यानि जीवित पाया ...
कल की सुबह,
सुबह का संगीत
याद आया,
घूमना और
दिन की पूजा
खाना,
सब याद आया,
याद आया-
अकेली बत्तख का
झील में तैरना ,
झील की बंधी किनारी के साथ बने
वॉकिंग ट्रेक पर कुत्तों का
आसमान की ओर ताकते
इधर-उधर दौड़ना,
जल कुकड़ों का तैरते -तैरते
पानी पर दौड़कर
अचानक उड़ जाना ,
फिर
पानी में डुबकी लगा
मछली पकड़ना
उस पकड़ी मछली को
चील का आकाश से
अचानक नीचे आ
झपट्टा मार उसके मुंह से छीन लेना
दूसरी चीलों का उसपर
झपटना,और
मछली का ट्रैक पर गिर जाना
और कुत्तों का भोजन बनना....
यानि
दाने-दाने पर खाने वाले का नाम है
और जीवित रखा तो ,
पालना- पालनहारे का काम है ....

Sunday, June 18, 2017

एक साधारण से गली क्रिकेट के प्लेयर की कहानी

रोज मॉर्निंग वॉक पर घूमने जाने पर वे एक फ्लैट की खिड़की से बाहर देखते हुए दिखते हैं शाम को भी वे उसी खिड़की पर बैठे सामने दिख रहे मैदान में क्रिकेट खेल रहे बच्चों को देखते रहते हैं ....
एक समय था जब वे बहुत अच्छे खिलाड़ी हुआ करते थे ,अपने शहर के ।अपने जवानी के दिनों में बहुत नाम कमाया इस खेल से उन्होंने, कहते हैं कि खूबसूरत तो बला के थे ही स्टाईलिश भी कम न थे, कभी लंबे बाल तो कभी छोटे बाल ,कभी हेट का स्टाईल तो कभी टोपी का स्टाईल बदलते ही लोग दीवाने हो जाते उनके ,खेल तो खैर जो था सो था,क्रिकेट के खेल में चल गए तो चल गए कभी बल्ला बोला तो कभी बॉल बोली लेकिन अगर दोनों न बोले तो लोगों की गालियां तो बोलती ही हैं ....सुनने को जरूर कुछ मिलता है अपने बारे में अच्छाई हो या बुराई अखबारों में जगह पक्की समझो।भले लोकल न्यूज ही क्यों न हो
गावसकर के बाद कपिल और सचिन से होता हुआ ये खेल हर भारतीय पुरुष का अपने गोत्र की तरह चिपका हुआ खेल बन गया ।खुद उसे पता ही नहीं चल पाता कि कब बॉल और बेट उसके हाथ में पकड़ा दिया जाएगा,कब गली के भैया की बॉल दौडदौड कर फेंक कर वापस देने के कारण उसे टीम का मेम्बर  बनने का चांस मिल जाएगा, और माँ -पिता के घिसे-पिटे संस्कारित प्रवचनों से छूटने का इतना आसान मौका मिलेगा हर दिन मैच खेलने के बहाने ....
ये सोचते सोचते कि बस इस बार जिले से आगे स्टेट टीम में चुने गए तो और आगे कभी न कभी  रणजी में तो चुन ही लिए जाएंगे पढ़ाई लिखाई ताक पर रखी रही ,सिलेक्शन न होना था न कभी हुआ ।
घरबार की जिम्मेदारी के चलते उसी मैदान में कोच बन गए ,समर केम्प चलाने लगे ,सोचते बस एक सचिन निकाल दें किसी तरह तो जिंदगी संवर जाए ...और कभी कोई दूसरा सचिन न निकला .....
अब बच्चों के भरोसे हैं, बैठे रहते हैं खिड़की से चिपके..

Monday, June 12, 2017

व्हाट्स एप मैत्री का अंत


व्हाट्स एप पर नए नंबर से Hiii  के बाद एक प्रश्न और आगे दो टेक्स्ट मेसेज तीन फ़ोटो मेसेज और अंत में फिर वही प्रश्न...

टेक्स्ट मेसेज में पहले का अंश -
परखो तो कोई अपना नहीं
समझो तो कोई पराया नहीं
Good morning

दूसरे का अंश -
सुख दुख तो अतिथि हैं
बारी बारी से आएंगे चले जाएंगे
यदि वो नहीं आएंगे तो
हम अनुभव कहां से लाएंगे
Good morning

फ़ोटो मेसेज में पहला -



दूसरे में -
सुबह की राम राम

तीसरे में-
Enjoy your sunday
(अंग्रेजी में ही, चाय के भरे हुए कप पर )
फिर दो बार वही प्रश्न और एक नया प्रश्न

(इतना लिखते लिखते 3 मेसेज और आ गए , चेक किया तो तीन फ़ोटो और थे पहला फिर एक चाय का कप पर इस बार हाथ में पकड़ा और उस पर दो चिड़ियाएँ बैठी थी good morning पकड़े
दूसरा -

 और तीसरे में लिखा हुआ है-
यकीन और दुआ
नज़र नहीं आते
नामुमकिन को
मुमकिन बना देते है
Good morning

इतने में एक और मेसेज
वाक्य टपक पड़ा -
Aap ko nhi karna he mat kar na.....

अब आप पहले प्रश्न जान लें -
पहले बार बार रिपीट होने वाला प्रश्न-
Aap kha se ho

और दूसरा -
Aap moje se friendship karo ge

...और मैनें इस मासूम सी बच्ची की प्रोफ़ाईल फ़ोटो वाले नंबर को ब्लॉक कर दिया... दिमाग का दही बना देने के एवज में .......
बादलों से ढँके एक खूबसूरत रविवार की सुबह - सुबह ...