Tuesday, September 12, 2017

टुकड़ा-टुकड़ा कहानी

1-
"रूको,तुम्हारे जूते में अब भी मेरा पैर नहीं आता ..... हाथ में ले लेने दो .....
.
चलना तो है ही पीछे-पीछे ...शुरू से ही पीछे जो रह गई हूं..... :-("
.
.
. ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...:-(
2-
चलो खींच दो न अब वो ऊपर से अटकी चुनरी....... उचक-उचक थक चुकी ....
दूसरे रंग मैच भी तो नहीं करते इस चणिया चोली से .....
फ़िर कहोगे - ऐसे ही बैठी हो तब से ...?... :-P
.
. ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...:-(

3-
जानबूझ कर इतना ऊपर चढे बैठे हो ....
पहले तो कह्ते थे - समन्दर की गहराई में देखो ... कितने रंग छुपे हैं , और अब न जाने क्यों ,बादलों के पीछे छुपा इन्द्र धनुष ही भाने लगा है तुम्हें ......
जानते हो! कि मुझे मुड़कर देखने की आदत है ... सो लगे चिढाने .... ... आखिर धूप चश्में पर तरस भी तो नहीं खाती .......
ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...

4-
आज संडे तो नहीं है पर छुट्टी जरूर है .... और पहली चाय की बारी तुम्हारी है .....
.
.
. ये कभी भूलते क्यों नहीं तुम ..... और मुझे खाना बनाने में देर हो जाती है ....
उफ़्फ़! ...

ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...

5-
...ये खिड़की बन्द नहीं हो रही ... रात भर आवाज करेगी ....
-तुमने कारपेंटर को बुलाया नहीं ?
-नहीं, लगा था कर लूंगी बन्द ...पर नहीं पता था , जो काम मैंने किये नहीं वो मुझसे वाकई नहीं होंगे .....
... अब रात भर चांद दिखते रहेगा झिर्री से ....

ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...
6-
बाथरूम के नल से टपकते पानी की बूंद रह-रह कर डरा देती है रात को .... कपड़ा ढूंसना चाहा तो वो पेंचकस नहीं मिला , हरे हत्थे वाला ...
पता नहीं कहां रख दिया मैंने ...उसका डिब्बा तो कब से इधर -उधर हो गया ...
एक अकेला वो बचा था ... वो भी ....:-(
और ये काम भी तो तुम्हारा ही था न ....
गिनूंगी बूंदे ...

ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...

7-
याद है ! एक बार तुम्हारे दोस्त ने कहा था-
-
भाभी जी आपने बदल दिया हमारे दोस्त को , एक बार आप बोल देंगी तभी शुरू करेगा फ़िर ..
- अबे यार चुप !... कहकर चुप करा दिया था तुमने उसे
- क्या बन्द किया मैंने ? मैं तो कुछ भी नहीं कहती ...
-हाँ , तभी तो.... आपको पता है ये नॉन्वेज खाता भी था और बनाता भी था ....
-नहीं तो.....
-क्यों बताया नहीं तूने? ... फ़िर वो तो चला गया ...
और मैं बहुत गुस्सा हुई थी , .... बात नहीं की थी तुमसे, चुपचाप खाना बनाया और मुझे भूख नहीं कहकर सोने चल दी थी.....
तब तुमने बताया था कि अपनी सगाई तय होने के समय तुम्हें पता चला था कि मेरा परिवार शुद्ध शाकाहारी है , और उस दिन से तुमने खाना छोड़ दिया था ...वरना शादी नहीं हो पाती अपनी ...
.....
.... तब मैं सोचती थी क्या फ़र्क पड़ जाता शादी नहीं होती तो ......
...
..
.. अब समझी ....... हां बहुत फ़र्क पड़ता ..... :-(

ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...

8-
-- इनसे मिलो ये हैं बनर्जी ,साथ ही रहते थे हम पहले एक रूम में
-नमस्ते
-नमस्ते भाभी जी , सुना है आपने लॉ किया है?
- जी
-तो प्रेक्टिस नहीं करेंगी आप ?
- जी, अभी तो एक्ज़ाम ही दी है , और यहाँ आ गई... आगे सोचेंगे जैसा भी होगा
- आप तो फ़िलहाल यहीं कंपनी की स्कूल में अप्लाई कर दीजिये, हिन्दी भी अच्छी है आपकी..
- जी नहीं, मुझे टीचर नहीं बनना..
-क्यों?
- किसी के अन्डर में काम करना पसन्द नहीं,मतलब वही पुराना सा तय सिलेबस सिखाओ ,
जो खुद से सिखाना चाहूं वो सिखा पाउं तो हो सकता है... कभी बन भी जाउं .... :-)

ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...

9-
एक बात फ़िर याद हो आई आज,
जब तुमने कहा था-
-सुनों याद है न कल बिटिया के एडमिशन के लिए जाना है
-हाँ याद है, पर मम्मी-पापा को क्या पूछेंगे , मैं तो हिन्दी में ही जबाब दूंगी अंग्रेजी में देना हो तो आप बोलना
-लेकिन अगर इसी बात पर एडमिशन नहीं हुआ तो ?
- ऐसा हो सकता है?
-हाँ हो सकता है,
- तब देखी जाएगी ,मैं बात कर लूंगी पर आप न बोलना फ़िर
- ओके
.....
.....
और इसके बाद आठ दिन का समय मांग लिया था मैंने प्रिसिपल मैडम से ... और पूरे हफ़्ते मेरे अंग्रेजी में बोले बिना आपने मेरी बात का जबाब नहीं दिया था ...खूब हँसे थे उस पूरे हफ़्ते हम 
और आठ दिन बाद बिटिया का एडमिशन हो गया था .....
...
...
लेकिन उसके बाद कभी अंग्रेजी बोली नही गई मुझसे .....

ऐसे ही किसी टुकड़ा कहानी से - जो न जाने कब पूरी होगी ...

Saturday, August 19, 2017

विश्व फोटोग्राफी दिवस विशेष

पिछले दिनों इंदौर ने प्रथम स्थान हासिल किया स्वच्छ शहर प्रतियोगिता में ,हम गौरवान्वित हुए।अभी बहुत काम होना है,इसे बनाये रखना आसान नहीं ,लोगों में स्वच्छता की आदत लगाये रखना जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण है सफाईकर्मियों का अपने कार्य के प्रति समर्पण...
ये तस्वीर आज सुबह करीब 7 बजे की है - विश्व फोटोग्राफी दिवस की शुरुआत इससे बेहतर नहीं हो सकती थी ...आप भी देखिए-

Thursday, August 17, 2017

भला कर भले मानुष

आजकल जिस एप्प की चर्चा चल रही है, उसके बारे में एक ही विचार आया कि कोई किसी को पीठ पीछे गाली क्यों देना चाहता है ?
अगर व्यक्ति कोई गलत बात कह रहा है, तो उसे जब तक सामने नहीं बताया जाएगा उसमें सुधार संभव नहीं है, पीठ पीछे कही बात जब तक उस तक पहुंचती है तब तक या तो वो व्यक्ति कईयों को नुकसान पहुंचा चुका होता है,या खुद नुकसान उठा चुका होता है ...
ये जरूरी नहीं कि आपको जो बात गलत लगी वो उसके लिए भी गलत हो लेकिन आगाह करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए अगर हमें महसूस हो,एक विचार के हर नकारात्मक पक्ष को सामने लाये जाने पर ही उसकी सकारात्मकता को बढ़ाया जा सकता है ,ऐसा मैं सोचती हूँ।
अनजान बनकर दूसरों का भला करना सबके बस का नहीं 😊ये भी कटु सत्य है।
एक गीत याद आ रहा है ,मालूम नहीं किसका लिखा हुआ है -

भला किसी का कर न सको तो,बुरा किसी का मत करना
पुष्प नहीं बन सकते तो तुम- काँटे बनकर मत रहना ....

Sunday, August 13, 2017

छेड़छाड़ का चरमानंद

छेड़छाड़ शब्द भ्रष्टाचार मोहल्ले की गड़बड़ की बिरादरी का है,मतलब इधर-उधर की गली में रहने वाला कह सकते हैं, प्रथमदृष्टया पढ़ने पर लड़के द्वारा लड़की को छेड़ना ही दिमाग में आता है क्योंकि सबसे ज्यादा प्रचलन यानि प्रचार इसी के द्वारा हुआ,परंतु परेशान करने से ज्यादा हेरफेर होती है क्या इस शब्द से... जाँच का विषय हो सकता है ...
हेरफेर को समझें जाँच से -यदि कोई व्यक्ति अपनी जाँच किसी पैथोलॉजी में करवाता है और उसके दिए नमूने से छेड़छाड़ हो गई तो समझो अच्छा खासा व्यक्ति भी केंसर का बीमार घोषित हो सकता है ये तो हुई सिर्फ डॉक्टरी पेशे की बात यदि वकालात का पेशा हो तो फाइलों के साथ छेड़छाड़ भले आदमी को सलाखों के पीछे पहुँचा सकती है,यदि शिक्षा जगत की बात हो तो आप बिना पढ़े कई डिग्रियों के स्वामी बन सकते हैं सिर्फ छेड़छाड़ करवा के अपनी उत्तरपुस्तिकाओं में ....😊
आजकल और आगे बढ़ गया है साइंस -आप डी एन ए रिपोर्ट तक से छेड़छाड़ करवा कर किसी के पुत्र साबित हो सकते हैं या जिम्मेदारी से मुक्त हो सकते हैं ...
आजकल लेखन में छेड़छाड़ भी चरम पर देखने को मिलती है,किसी के लिखे की पंक्तियों में छेड़छाड़ कर खुद को लेखक साबित करने लगे हैं लोग और तो और अब हाथ का लिखा तो इतिहास की गर्त में समाने लगा है, कॉपी पेस्ट के जमाने में छेड़छाड़ को आसान राह मिल गई तो चरम के भी चरमानंद को प्राप्त करने की होड़ मची है ...

Friday, August 4, 2017

फेसबुक पर धतर-मतर कुछ भी पढ़-पढ़ कर भेजे का बना भुरता

कुछ भी लिख देने को कैसे मन हो जाता है,किसी का भी?
क्या ये वे लोग लिख देते हैं?-जिनके माता-पिता या दादा-दादी ने बचपन में पीछे से हाथ न धरा गोद में बिठाकर, सिर पर हाथ न फेरा,या बहन ने राखी न बाँधी, या भाई ने अपना हिस्सा नहीं बाँटा,या फिर शादी के बाद पत्नी ने ही साथ न निभाया या कि अपना पौरुष कहीं खो आये,या हो सकता है पौरुष खुद ही साथ छोड़ गया उनका ....
या बच्चों ने बाहर का रास्ता दिखा दिया उम्र के ढलान पर, लुढ़का दिया बे-पेंदे के लोटे की तरह... या हो सकता है अपनी पहचान की तलाश में काँटों भरी गलत राह चुन ली...और दोस्त भी न बना कोई ...

खैर! वे जानें ,उन्हें बीमारी कौनसी है? 😊
लेकिन इलाज तो ये पता है कि -जब तक ऐसे लोग,जो कुछ भी लिख सकते हैं,स्त्री,महिला,नारी या मादा के लिए आदर और सम्मान के एक -दो शब्द न लिखेंगे,जिंदगी के मायने उनको नहीं आएंगे,जीना वे कभी सीख नहीं पाएंगे यहाँ तक कि मौत भी उनकी जल्दी नहीं आएगी ,यहीं पड़े वमन करते,सड़ते रहेंगे .....

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ये था काल्पनिक अध्याय 19 का भावानुवाद जो कृष्ण ने अपनी माताओं,सखियों और प्रेम की दिवानियों को स्वर्ग में चुपके से समझाया ,उनके प्रश्नों की जिज्ञासा में .....अपन भी वहीं थे तब 😊
और अब -
अपनी डॉक्टरी तो इत्ता जानती है,बस!...😊 
और ये डॉक्टरी ऐसी वैसी तैयारी से नहीं मिली,पूरी थीसिस समझी यहीं फेसबुक पर झख मारकर .....☺

Wednesday, August 2, 2017

जीवटता की मिसाल - आशालता जी

पिछले कई दिनों से ब्लॉग लेखिकाओं से मुलाकात के योग बनते रहे...
मैं टुकड़ा टुकड़ा बँटी रही इंदौर ,बंगलौर और खरगोन के बीच...
इससे पहले जब इंदौर में थी तब एक दिन अचानक आशालता जी का फोन आया कि मैं हॉस्पिटल में हूँ,पैर में रॉड लगी हैं, आपकी याद आई तो फोन मिला लिया, उन्हें ब्लॉगर के तौर पर जानती थी, फिर तभी तय किया कि हॉस्पिटल जाकर मिला जाए, संभव हुआ ,खोजते हुए पहुँच ही गई थी,बेटे और अपने श्रीमान जी के साथ परिचय करवाया,हालांकि उससे पहले भी एक बार उनके घर ऐसे ही न्यौता था उन्होंने और मैं पहुंच गई थी तब भी...
खैर जैसे ही मुझे देखा उनके चेहरे पर रौनक आ गई, जितना समय रुक सकती थी रुकी उनके पास वे बतियाते रही थीं - लेखन अपनी पढ़ाई अपने परिवार,माता,पिता सबके बारे में......

4-5 महीने पहले फिर एक दिन फोन आया कि मैं फिर हॉस्पिटल में हूँ,लेकिन तब चाहकर भी मिलना नहीं हो पाया था ..वे उज्जैन चली गई थीं,फिर एक दिन दामाद जी के साथ आधे रास्ते तक उज्जैन के लिए निकली भी लेकिन अचानक केंसल हुआ और हम रास्ते से ही वापस लौट आए ।
फिर मैं बंगलौर चली गई....इस बीच आशा जी का स्वास्थ्य और खराब हुआ, पेरेलिसिस अटैक आया ,मुझे बेहद अफसोस हुआ कि उनसे मिल न पाई, लेकिन इस बीच व्हाट्सअप ग्रुप बनाया " गाओ गुनगुनाओ शौक से"उसमें संगीता अस्थाना जी के आग्रह पर साधना वैद जी जुड़ी ..और मुझे पता चला कि वे आशा जी की सगी बहन हैं ।उनके हालचाल मिलते रहे । इस बार जब इंदौर आने का प्लान बना तो आशा जी से मिलना प्राथमिकता में था और आज वो संयोग बना.... आज मैं ,पल्लवी,मायरा और नीलेश - आशाजी से मिले उनके घर जाकर, वे इतनी खुश हुई कि मेरे पास बताने को शब्द नहीं,पहले की ही तरह हर विषय पर बात की,कैसे शादी के बाद पढ़ाई जारी रखी बिस्तर से उठ तो नहीं सकती थी,लेकिन मजबूत  ईच्छाशक्ति की मालकिन फिर उसी जोश से मिली ,मुझे उनकी प्रकाशित पुस्तक भेंट की, लेखन अब भी जारी है,मायरा ने भी भरपूर मनोरंजन किया उनका..कविताएं और श्लोक सुनाए डांस दिखाया,.....बहुत अच्छा लगा एक दिन ऐसे बीतना...👍ढाई साल से बिस्तर पर स्वास्थ्य से लड़ाई करती हुई आशालता जी के साथ थोड़ा सा वक्त बिताना.
ईश्वर से प्रार्थना है वे और जल्दी स्वस्थ हों और लेखन जारी रखें !

Tuesday, August 1, 2017

ब्लॉगर-ब्लॉगर मौसेरे भाई

हम  .... जो लोग ब्लॉग पर लिखने की वजह से एक-दूसरे को जानने लगे। ..एक -दूसरे पर ज्यादा विश्वास/भरोसा कर लेते हैं/करते हैं/,बनिस्बत फेसबुक की वजह से जानने वालों के। ....
हैं तो दोनों आभासी संसार .... पर कभी जात न पूछी साधू की। .. :-)

कितनी भी खींचतान हो आपस में पर मुझे विश्वास है कि मदद के लिए पुकारा तो सब ओर से हाथ उठेंगे ....

पुरानी पंक्तियाँ याद आ गई -

बहुत किए थे वादे
थे भी नेक इरादे
पर टूट गए सारे
वक्त ने वक्त ही नहीं दिया
सारे वादों को ही बेखौफ़ तोड़ दिया
वो शायद डर जाता है नेक इरादों से
घबराता है प्यार के प्यादों से
पर नहीं जानता शायद
प्यार करने वाले
प्यार करते हैं शान से
जीते हैं शान से
मरते हैं शान से....

देखो ! देर हो सकती है पर अंधेर नहीं.....
और अंत में एक श्लोक-

अक्रोधेन जयेत् क्रोधम् , असाधुं साधुनां जयेत् ।
जयेत् कदर्यं दानेन् , जयेत सत्येन चान्रतम् ॥

अर्थ-
क्रोध को ,क्रोध न करके जीतना चाहिये , दुष्ट को साधुभाव  द्वारा जीतना चाहिये , कंजूस को दान द्वारा जीतना चाहियेऔर झूठ को सत्य द्वारा  जीतना चाहिये।

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

Monday, July 31, 2017

शान्ति की खोज #हिन्दी_ब्लॉगिंग

पिछले दिनों फेसबुक पर किसी की शेअर की हुई कहानी पढ़ी,मालूम नहीं सच थी या कहानी थी,उसमें बताया था कि एक स्त्री अपने पति की मृत्यु के बाद अपने छोटे से बेटे को कई मुश्किलों का सामना कर के बड़ा करती है,उसकी हर सुविधा का ध्यान रख कर उसे उच्च शिक्षा दिलवाती है बच्चा आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाता है ,वहीं शादी कर लेता है, माँ उसके आने की राह देखती रहती है,लेकिन वो नहीं लौटता,स्त्री के अड़ोसी-पड़ोसी इस बीच उसका खयाल रखते हैं, उसको अपने परिवार का सदस्य मानकर सम्मान देते हैं ,और आखिर में वो बीमार हो जाती है ,बेटे को बीमारी की खबर भी कर दी जाती है, और उसके आने का इंतजार करते हुए स्त्री अपनी अंतिम साँसे गिनती है,पर चल बसती है उसकी ईच्छा बेटे से मिलने की पूरी नहीं हो पाती...
उसी बेटे के व्यवहार से अड़ोसी-पड़ोसी दुखी होकर भी  अब उसकी माँ की ईच्छा और सम्मान की खातिर उसके घर की चाबी उसके सुपुर्द करने का इंतजार कर रहे हैं, कि अब शायद वो आए.....

मुझे अपनी दादी की कही एक कहावत याद आई -

पूत सपूत तो क्यों धन संचय
और पूत कपूत तो क्यों धन संचय....

सही है-
बेटा हो या बेटी,अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के साथ जिम्मेदार बनाना भी उतना ही जरूरी है .....धन का संचय जरूरत से ज्यादा करना व्यर्थ है,बच्चों को मितव्ययिता के साथ संयम सिखाना भी बहुत जरूरी है..और ये पाठ पाठ्यपुस्तकों में नहीं मिलेंगे .... अगर बच्चे खुद सपूत यानि काबिल हुए तो कभी आप पर निर्भर होना नहीं चाहेंगे, खुद कमा लेंगें,आप चिंता न करें,और अगर कपूत हुए तो सदा आप पर निर्भर राह आपका संचित धन उजाड़ देंगे,,तब संचित धन व्यर्थ गलत उपयोग होकर नष्ट हो जाना है .....
उन्हें आप पर निर्भर नहीं रखना चाहिए ...

लेकिन "ममता","समाज",और "लोग क्या कहेंगे"जैसी बातों के चलते सदा समाज में ऐसी कहानियाँ दोहराई जाती रही हैं/रहेंगी.....

पता नहीं कब तक
वही आंसू
......
फिर वही शांती
फिर वही पैग
फिर वही पिता
फिर वही माता
फिर वही कुपुत्र
और ...
अनंत तक चलने वाली

शान्ति की खोज ....

Monday, July 24, 2017

आँखों की उदास पुतली और नमीं

आँख खुलते ही बारिश की टिप-टिप सुनाई दे रही है कभी तेज कभी धीमी ..पिछले दिनों दो छुट्टी बारिश की वजह से हो गई थी ..मैंने चाय बना ली है ,बार -बार ध्यान फोन पर जा रहा है , कहीं आज भी छुट्टी की खबर न आ जाए .... हमेशा तो खुशी हो जाती है लेकिन आज मन कह रहा है छुट्टी न हो ... कारण ....?
कारण ये कि कल उसने मुझसे हजार रूपए मांगे थे ...पूछने पर कि क्यों चाहिए?
...बताया कि हमको पैसे मिलेंगे तब आपको वापस कर देंगे ..
मैंने पूछा- क्यों चाहिए ये ? और क्या इस माह पैसे नहीं मिले ?
सकुचाते हुए बोली -मिले थे ,मगर हमने पिछली बार जिससे उधार लिये थे ,उसको वापस कर दिये ,और भाई की फीस भर दी ...
मेरा अगला सवाल था - माँ भी तो काम करती है,और पिताजी क्या करते हैं?
-पिताजी दूसरी स्कूल बस पर कंडक्टरी करते हैं.... माँ और मेरे को दोनों को मिली थी तनखा ,मगर बचे नहीं .... पिताजी को बहुत छुट्टी करनी पड़ गई थी ...
मेरा अगला सवाल था कितने भाई-बहन हो ?
- हम चार बहनें और सबसे छोटा भाई..
भाई स्कूल जाता है ,
-और तुम्हारी छोटी बहनें ?(ये जानती थी कि ये सबसे बड़ी है और आठवीं के बाद पढ़ना छोड़ दिया है)
-वे घर पर ही रहती है ...उनके टी.सी. लेने के लिए ही तो पिताजी को छुट्टी लेनी पड़ी .आगे दाखिला नहीं मिल रहा कहीं ...और गाँव की स्कूल वाले बोलते हैं -अभी नहीं बनी बाद में आना ... पिछला पूरा साल ऐसे ही निकल गया ....
ओह! कह कर मैं चुप हो गई ....
फिर कहा उसने कि -मैंडम जी गैस की छोटी टंकी  है हमारे पास, वो खतम हो गई है ...अभी किसी से स्टोव मांग कर ले लेते हैं ,और उसपर खाना बनाना पड़ता है ...बहुत परेशानी हो रही है... दो दिन से मेरी तबियत भी ठीक नहीं लग रही सिर दुखता है,बुखार जैसा भी लगता है .......कहते-कहते उसकी आँखें नम हो गई .... जिसे वो छिपाने की कोशिश कर रही थी ....
अब मैं चकित थी ,मैंने अपना पर्स टटोला पाँच सौ का एक नोट था और दो तीन सौ-सौ के.... 500 का उसको देते हुए कहा - अभी यही है .पाँच सौ कल ला दूँगी ...

घर में कमाने वाले तीन खाने वाले सात ....और एक भाई के लिए चार बहनें ....
कब तक ?
..
और आज जाना ही होगा स्कूल .... यही सोच रही हूँ काश आज छुट्टी न हो .....
….…….…
होकर आई थी स्कूल....उसकी माँ को दिए शेष रुपए.........दोनों की आँखों में एक बात समान देखी......उनकी उदास पुतली और नमीं.......:-(

आज फिर बारिश की टिप टिप वाली सुबह ने उनकी याद दिला दी ..
मुझे स्कूल छोड़े डेढ़ साल बीत गया है...जाने कैसे चूल्हा जलता होगा उनका .... बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के पोस्टर लगी स्कूल बस पर कंडक्टरी करते उस पिता ने बेटियाँ बचा तो ली पर उन्हें पढ़ा पाया या नहीं कौन जाने !!!
अब मेरी आँखों में भी नमीं सी महसूस रही हूँ....

Sunday, July 23, 2017

एडवेंचरस बाढ़

सबकुछ बहा कर ले जाये,वो बाढ़, उथलपुथल मचा कर रख दे,वो बाढ़, तहस नहस कर दे,वो बाढ़, यहाँ से उठाकर वहाँ पटक दे वो बाढ़, बाढ़ नाम ही दहशत का प्रतीक है,जब भी आती है इंसान,जानवर,सजीव,निर्जीव किसी में कोई भेद नहीं ।
बाढ़ करती है तांडव जैसे शिव ने किया ,तबाही मचा देती है, बाढ़ शब्द अतिरेक का है, लेकिन बाढ़ के बाद क्या और बाढ़ क्यो?बाढ़ शब्द से पहला अर्थ पानी के बढ़ने से ही लगाया जाता है ,बरसात के मौसम में नदी नाले उफान पर आ जाते हैं जमीनी असंतुलन होने,तेजी से बढ़ते पर्यावरण असंतुलन के कारण नदियों में जब इधर उधर न जाने किधर किधर से आकर पानी आकर समाने लगता है तो किनारे न बंधे होने से बाढ़ की स्थिति आ जाती है नदी को भी लगता है सालभर तो सूखे ही रहना है सबको लपेट लें चलो सो जहाँ तक हाथ मार सकती है मार देती है ... वैसे मौका मिलने पर हाथ कौन नहीं मारना चाहता, ज़रा सोचिए, बचपन से लेकर अब तक आपने कब और कहां हाथ मारा ,स्कूल पेंसिल ले जाना भूल गए साथी की टेबल से हाथ मार उठा ली,भूख लगी टिफिन पर हाथ मार दिया,अकेले हैं साथी की पीठ पर मार दिया दुकानदार बने ,हाथ मार दिया,राजनेता बने जहाँ तक बस चला बस हाथ ही मारते रहे.... समेट लिया सब अपनी बाढ़ में .... खुद तो इठला कर चले और पलट कर भी न देखा, बाढ़ के  बाद देखने को कौन पलटा है .... जंतर मंतर पर इंसानी बाढ़ देखी,उसके बाद का मंजर देखा,देखते ही जा रहे हैं ,सब तितर- बितर  हो गए......सरदार सरोवर  देखा ...हरसूद खत्म ... केदारनाथ देखा ...रामबाड़ा खत्म... जंतर मंतर देखा ..अन्ना खत्म ......बाढ़ में भी एडवेन्चर तलाशते हैं लोग...घोटालों की बाढ़ ,एडमिशन की बाढ़ याद होगी व्यापम की ...
लेकिन खत्म होने के बाद कि शांति ज्यादा डरावनी होती है बाढ़ के बाद की .... खत्म हो जाने के बाद नई ताकत झोंकना पड़ती है,आदमी को जानवर को पेड़पौधों को नए सिरे से जीवन शुरू करना होता है , अब हाथ मारने वाली बात खत्म होकर हाथ बढ़ाने/देने की बात होने लगती है ....बाढ़ की तबाही मेलमिलाप बढ़ा देती है, जो कल तक अपने नहीं होते, वे अपने होने लगते हैं, जिसकी पूछपरख नहीं होती अगर उसने हाथ बढ़ा दिया तो उसकी पूछ परख होने लगती है ....फिर से उठ खड़े होने को बाढ़ जरूरी है, सड़ा-गला बहा ले जाने को बाढ़ जरूरी है....प्रकृति में संतुलन चाहे पेड़पौधे हों,जीवन हो,या आदमी के स्वभाव में संतुलन की बात हो बाढ़ आते रहनी चाहिए ,तबाही तो वैसे ही होनी लिखी है मरना तो सबको है ही तो बाढ़ के बाद का जीवन जीकर ही सही .......
आखिर एडवेन्चर का जमाना है ....

Friday, July 21, 2017

याद तुम्हारी

"अगर उसने कुछ सोचा होगा तो
मुझे भी सोचा होगा
हल्के-हल्के हाथों से फिर,
अपनी आँखों को पोंछा भी होगा
देख उँगली पर अटकी बूँद-
एक हल्की सी मुस्कुराती लकीर,
उसके होंठो को छूकर गुज़री होगी
और झटक दिया होगा सिर कि -
ये यादों का लोचा होगा ......."
.-अर्चना चावजी

Tuesday, July 18, 2017

बरसो रे !

भूल गए हैं बादल अब बरसना वहाँ ,
खूब बरसती है आसमान से आग जहाँ....

भागते मेघों का गर्जन भी दब जाता है
काली बदली को पवन जाने कहाँ उड़ा ले जाता है

मोर,पपीहे,कोयल सब अब मौन मौन ही रहते हैं
नदिया ठहरी,झीलें सूखी,झरना भी नहीं गाता है

थिरकती बूँदों के नृत्य कौशल को देखने 
हर बूढ़ा पेड़ व्याकुल नजर आता है...

Monday, July 17, 2017

क्यों लड़ते हैं लोग घरों में ?

उसके घर का आने -जाने का रास्ता घर के पिछले हिस्से से होकर है ,मेरे और उसके ,दोनों घर के बीच में सामान्य अन्तर है .. बातचीत, नोक-झोंक ...सब सुनाई देता है ...
कामकाजी बहू है ..... सास और बहू दोनों ताने देने में मास्टर हैं ....

- खा-खा कर मोटी हो रही है
-इनके लिए हड्डी तोड़ते रहो तब भी चैन नहीं पड़ेगा
- काम पे क्या जाती है  ,इनके पर निकल आए हैं..
- जा बेटा ,साबुन से हाथ धोना ... तेरे लिए मैं लेकर आई हूँ  साबुन ...
....
....

"कान पक गए" .....मुहावरा पक्के से समझ आ गया है ..... :-(

हर छुट्टी के दिन पूरा दिन ... खराब हो जाता है ...
और तो और त्यौहार भी नहीं बचते ....
.
....

...क्यों लड़ते हैं लोग ...घरों में .....

Friday, July 14, 2017

बरसात की शिकायत - व्यंग्य

आज सुनिए यामिनी चतुर्वेदी जी के ब्लॉग मनबतियाँ से एक व्यंग्य-




चुपचाप रहने के दिन

ये बारिशों के दिन। ..
चुपचाप रहने के दिन ....

मुझे और तुम्हें चुप रहकर
साँसों की धुन पर
सुनना है प्रकृति को ....
. उसके संगीत को ...
झींगुर के गान को ..
मेंढक की टर्र -टर्र को...
कोयल की कूक को...
और अपने दिल में उठती हूक को। ....
....
बोलेंगी सिर्फ बुँदे
और झरते-झूमते पेड़
हवा  बहते हुए इतराएगी...
और
अल्हड़ सी चाल होगी नदिया की

चुप रहकर भी
सरसराहट होगी
मौन में भी एक आहट होगी
...
उफ़! ये बारिशों के दिन ..
चुपचाप रहने के दिन।
-अर्चना