Monday, July 24, 2017

आँखों की उदास पुतली और नमीं

आँख खुलते ही बारिश की टिप-टिप सुनाई दे रही है कभी तेज कभी धीमी ..पिछले दिनों दो छुट्टी बारिश की वजह से हो गई थी ..मैंने चाय बना ली है ,बार -बार ध्यान फोन पर जा रहा है , कहीं आज भी छुट्टी की खबर न आ जाए .... हमेशा तो खुशी हो जाती है लेकिन आज मन कह रहा है छुट्टी न हो ... कारण ....?
कारण ये कि कल उसने मुझसे हजार रूपए मांगे थे ...पूछने पर कि क्यों चाहिए?
...बताया कि हमको पैसे मिलेंगे तब आपको वापस कर देंगे ..
मैंने पूछा- क्यों चाहिए ये ? और क्या इस माह पैसे नहीं मिले ?
सकुचाते हुए बोली -मिले थे ,मगर हमने पिछली बार जिससे उधार लिये थे ,उसको वापस कर दिये ,और भाई की फीस भर दी ...
मेरा अगला सवाल था - माँ भी तो काम करती है,और पिताजी क्या करते हैं?
-पिताजी दूसरी स्कूल बस पर कंडक्टरी करते हैं.... माँ और मेरे को दोनों को मिली थी तनखा ,मगर बचे नहीं .... पिताजी को बहुत छुट्टी करनी पड़ गई थी ...
मेरा अगला सवाल था कितने भाई-बहन हो ?
- हम चार बहनें और सबसे छोटा भाई..
भाई स्कूल जाता है ,
-और तुम्हारी छोटी बहनें ?(ये जानती थी कि ये सबसे बड़ी है और आठवीं के बाद पढ़ना छोड़ दिया है)
-वे घर पर ही रहती है ...उनके टी.सी. लेने के लिए ही तो पिताजी को छुट्टी लेनी पड़ी .आगे दाखिला नहीं मिल रहा कहीं ...और गाँव की स्कूल वाले बोलते हैं -अभी नहीं बनी बाद में आना ... पिछला पूरा साल ऐसे ही निकल गया ....
ओह! कह कर मैं चुप हो गई ....
फिर कहा उसने कि -मैंडम जी गैस की छोटी टंकी  है हमारे पास, वो खतम हो गई है ...अभी किसी से स्टोव मांग कर ले लेते हैं ,और उसपर खाना बनाना पड़ता है ...बहुत परेशानी हो रही है... दो दिन से मेरी तबियत भी ठीक नहीं लग रही सिर दुखता है,बुखार जैसा भी लगता है .......कहते-कहते उसकी आँखें नम हो गई .... जिसे वो छिपाने की कोशिश कर रही थी ....
अब मैं चकित थी ,मैंने अपना पर्स टटोला पाँच सौ का एक नोट था और दो तीन सौ-सौ के.... 500 का उसको देते हुए कहा - अभी यही है .पाँच सौ कल ला दूँगी ...

घर में कमाने वाले तीन खाने वाले सात ....और एक भाई के लिए चार बहनें ....
कब तक ?
..
और आज जाना ही होगा स्कूल .... यही सोच रही हूँ काश आज छुट्टी न हो .....
….…….…
होकर आई थी स्कूल....उसकी माँ को दिए शेष रुपए.........दोनों की आँखों में एक बात समान देखी......उनकी उदास पुतली और नमीं.......:-(

आज फिर बारिश की टिप टिप वाली सुबह ने उनकी याद दिला दी ..
मुझे स्कूल छोड़े डेढ़ साल बीत गया है...जाने कैसे चूल्हा जलता होगा उनका .... बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के पोस्टर लगी स्कूल बस पर कंडक्टरी करते उस पिता ने बेटियाँ बचा तो ली पर उन्हें पढ़ा पाया या नहीं कौन जाने !!!
अब मेरी आँखों में भी नमीं सी महसूस रही हूँ....

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (26-07-2017) को पसारे हाथ जाता वो नहीं सुख-शान्ति पाया है; चर्चामंच 2678 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत यथार्थ चिंतन, शुभकामनाएं.
रामराम
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

Pushpendra Dwivedi said...

bahut khoob heart toching articles